अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 77/ मन्त्र 1
आ स॒त्यो या॑तु म॒घवाँ॑ ऋजी॒षी द्रव॑न्त्वस्य॒ हर॑य॒ उप॑ नः। तस्मा॒ इदन्धः॑ सुषुमा सु॒दक्ष॑मि॒हाभि॑पि॒त्वं क॑रते गृणा॒नः ॥
स्वर सहित पद पाठआ । स॒त्य: । या॒तु । म॒घऽवा॑न् । ऋ॒जी॒षी । द्रव॑न्तु । अ॒स्य॒ । हर॑य: । उप॑ । न॒: ॥ तस्मै॑ । इत् । अन्ध॑: । सु॒सु॒म॒ । सु॒ऽदक्ष॑म् । इ॒ह । अ॒भि॒ऽपि॒त्वम् । क॒र॒ते॒ । गृ॒णा॒न: ॥७७.१॥
स्वर रहित मन्त्र
आ सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषी द्रवन्त्वस्य हरय उप नः। तस्मा इदन्धः सुषुमा सुदक्षमिहाभिपित्वं करते गृणानः ॥
स्वर रहित पद पाठआ । सत्य: । यातु । मघऽवान् । ऋजीषी । द्रवन्तु । अस्य । हरय: । उप । न: ॥ तस्मै । इत् । अन्ध: । सुसुम । सुऽदक्षम् । इह । अभिऽपित्वम् । करते । गृणान: ॥७७.१॥
भाष्य भाग
हिन्दी (3)
विषय
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थ
(सत्यः) सच्चा [सत्यवादी, सत्यकर्मी], (मघवान्) महाधनी, (ऋजीषी) सरल स्वभाववाला [राजा] (आ यातु) आवे, और (अस्य) इस [राजा] के (हरयः) मनुष्य (नः) हमारे (उपद्रवन्तु) पास आवें। (तस्मै) उसके लिये (इत्) ही (सुदक्षम्) सुन्दर बलवाला (अन्धः) अन्न (सुषुम) हमने सिद्ध किया है, (गृणानः) उपदेश करता हुआ वह (इह) यहाँ (अभिपित्वम्) मेल-मिलाप (करते) करे ॥१॥
भावार्थ
राजा और राजा के पुरुष धर्मात्मा होकर प्रेम से प्रजा का पालन करें, और प्रजागण भी ऐश्वर्य बढ़ाकर उससे प्रीति करें ॥१॥
टिप्पणी
यह सूक्त ऋग्वेद में है-४।१६।१-८ ॥ १−(आ यातु) आगच्छतु (सत्यः) सत्यवादी। सत्यकर्मी (मघवान्) धनवान् (ऋजीषी) अर्जेर्ऋज च। उ० ४।२८। अर्ज संचये-ईषन्, कित्, ऋजादेशः, यद्वा, ऋज गतिस्थानार्जनोपार्जनेषु ईषन्, कित्, ऋजीष-इनि। ऋजुस्वभावः। सरलस्वभावः (द्रवन्तु) गच्छन्तु (अस्य) राज्ञः (हरयः) मनुष्याः (उप) (नः) अस्मान् (तस्मै) राज्ञे (इत्) एव (अन्धः) अन्नम् (सुषुम) अ० २०।३।१। वयं निष्पादितवन्तः (सुदक्षम्) शोभनबलयुक्तम् (इह) (अभिपित्वम्) अ० २०।२।६। संगमम् (करते) कुर्यात् (गृणानः) उपदिशन् ॥
विषय
सोमपान द्वारा 'इन्द्र' बनकर 'महेन्द्र' को पाना
पदार्थ
१. (सत्यः) = सत्यस्वरूप, (मघवान्) = ऐश्वर्यशाली, (ऋजीषी) = ऋजुता की प्रेरणा देनेवाला-कटिलता को दूर करनेवाला [ऋजु+इष] प्रभु (आयातु) = हमें प्राप्त हो। (अस्य) = इस परमैश्वर्यशाली प्रभु के (हरयः) = इन्द्रियाश्व (न: उपद्रवन्तु) = हमें समीपता से प्राप्त हों। ये इन्द्रियाँ हमें प्रभु की ओर ही ले जानेवाली हों। २. (तस्मा इत्) = उस प्रभु की प्राति के लिए ही (अन्धः) = सोम को (सुषुम) हम उत्पन्न करते हैं। यह सोम (सुदक्षम्) = उत्तम बल को प्राप्त करानेवाला है। हमें बल-सम्पन्न बनाकर ही यह सोम हमें प्रभु-प्राति का पात्र बनाता है। ये प्रभु (इह) = इस जीवन में (गणान:) = स्तुति किये जाते हुए (अभिपित्वम्) = हमारे अभिमत की प्राप्ति को करते-करते हैं। प्रभु का स्तवन यही है कि हम प्रभु से उत्पादित इस सोम का रक्षण करें। सोम-रक्षण से शक्तिशाली इन्द्र बनकर उस 'महान् इन्द्र' का सच्चा उपासन करते हैं।
भावार्थ
हमारी इन्द्रियाँ हमें उस सत्यस्वरूप, ऐश्वर्यशाली, ऋजुता की प्रेरणा देनेवाले प्रभु की ओर ले-चलें। प्रभु-प्राप्ति के उद्देश्य से ही सोम का रक्षण करते हुए हम प्रभु को प्राप्त करें। प्रभु ही सब इष्टों को प्राप्त करानेवाले हैं।
भाषार्थ
(सत्यः) सत्यस्वरूप अर्थात् त्रिकालस्थायी, (ऋजीषी) ऋजुमार्गाभिलाषी, (मघवा) ऐश्वर्यशाली परमेश्वर (आ यातु) हमारे हृदयों में प्रकट हो। (अस्य) इस परमेश्वर की (हरयः) कामादि की अपहारी-शक्तियाँ (नः) हमारे (उप) समीप (द्रवन्तु) द्रुतगति से प्राप्त हों। (तस्मै इत्) उस परमेश्वर के लिए ही (सुदक्षम्) उत्तमबलशाली (अन्धः) भक्तिरसरूपी अन्न (सुषुम) हम ने तैयार किया है। (गृणानः) गुरुवत् मार्गदर्शी परमेश्वर (इह) इस उपासना-यज्ञ में (अभि) साक्षात् (पित्वम्) भक्तिरस का पान (करते) करता है।
इंग्लिश (4)
Subject
Indra Devata
Meaning
May Indra, lord ruler of the world, ever true, mighty bounteous and ever righteous in natural ways, come to us. May his men and powers hasten to us to help and bless. For his sake we produce energising food and distil exciting soma. Praised and appreciated and praising and appreciating, he provides us all with sustenance and protection in this world order.
Translation
Let the righteous, simple-natured and Yajna-performing teacher come to us. Let the men of this teacher run towards us. We prepare nourishing and strength giving food for him. He preaching us establish a close contact with us.
Translation
Let the righteous, simple-natured and Yajna-performing teacher come to us. Let the men of this teacher run towards us. We prepare nourishing and strength giving food for him. He preaching us establishes a close contact with us.
Translation
May the Truthful Lord of Wealth, the Straightforward, leading all on the right path, come and His.evil-destroying forces of light and knowledge rush towards us (i.e., we may be able to realise Him quickly). We offer this well prepared juice of food-grains as oblation for His sake alone. Thus praised with song, let Him invest us with our object.
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
यह सूक्त ऋग्वेद में है-४।१६।१-८ ॥ १−(आ यातु) आगच्छतु (सत्यः) सत्यवादी। सत्यकर्मी (मघवान्) धनवान् (ऋजीषी) अर्जेर्ऋज च। उ० ४।२८। अर्ज संचये-ईषन्, कित्, ऋजादेशः, यद्वा, ऋज गतिस्थानार्जनोपार्जनेषु ईषन्, कित्, ऋजीष-इनि। ऋजुस्वभावः। सरलस्वभावः (द्रवन्तु) गच्छन्तु (अस्य) राज्ञः (हरयः) मनुष्याः (उप) (नः) अस्मान् (तस्मै) राज्ञे (इत्) एव (अन्धः) अन्नम् (सुषुम) अ० २०।३।१। वयं निष्पादितवन्तः (सुदक्षम्) शोभनबलयुक्तम् (इह) (अभिपित्वम्) अ० २०।२।६। संगमम् (करते) कुर्यात् (गृणानः) उपदिशन् ॥
बंगाली (2)
मन्त्र विषय
রাজধর্মোপদেশঃ
भाषार्थ
(সত্যঃ) সত্য [সত্যবাদী, সত্যকর্মী], (মঘবান্) মহাধনী, (ঋজীষী) সরল স্বভাবসম্পন্ন [রাজা] (আ যাতু) আসুক/আগমন করুক, এবং (অস্য) এই [রাজার] (হরয়ঃ) মনুষ্য (নঃ) আমাদের (উপদ্রবন্তু) নিকট আসুক। (তস্মৈ) তাঁর জন্যই (ইৎ) ই (সুদক্ষম্) সুন্দর বলযুক্ত (অন্ধঃ) অন্ন (সুষুম) আমরা প্রস্তুত করেছি, (গৃণানঃ) উপদেশ প্রদানপূর্বক তিনি (ইহ) এখানে (অভিপিত্বম্) সঙ্গম / সমাগম (করতে) করুক ॥১॥
भावार्थ
রাজা এবং রাজার প্রতিনিধি পুরুষ ধর্মাত্মা হয়ে আদর-সম্মান পূর্বক প্রজা প্রতিপালন করবে/করুক এবং প্রজাগণও ঐশ্বর্য বৃদ্ধি করে রাজার প্রতি প্রীতি করুক ॥১॥ এই সূক্ত ঋগ্বেদে আছে-৪।১৬।১-৮ ॥
भाषार्थ
(সত্যঃ) সত্যস্বরূপ অর্থাৎ ত্রিকালস্থায়ী, (ঋজীষী) ঋজুমার্গাভিলাষী, (মঘবা) ঐশ্বর্যশালী পরমেশ্বর (আ যাতু) আমাদের হৃদয়ে প্রকট হন। (অস্য) এই পরমেশ্বরের (হরয়ঃ) কামাদির অপহারী-শক্তি (নঃ) আমাদের (উপ) সমীপে (দ্রবন্তু) দ্রুতগতিতে প্রাপ্ত হোক। (তস্মৈ ইৎ) সেই পরমেশ্বরের জন্যই (সুদক্ষম্) উত্তমবলশালী (অন্ধঃ) ভক্তিরসরূপী অন্ন (সুষুম) আমরা প্রস্তত করেছি। (গৃণানঃ) গুরুবৎ মার্গদর্শী পরমেশ্বর (ইহ) এই উপাসনা-যজ্ঞে (অভি) সাক্ষাৎ (পিত্বম্) ভক্তিরস পান (করতে) করে।
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