अथर्ववेद - काण्ड {"suktas":143,"mantras":958,"kand_no":20}/ सूक्त 29/ मन्त्र 2
ऋषिः - मेधातिथिः
देवता - अग्नाविष्णू
छन्दः - त्रिष्टुप्
सूक्तम् - अग्नाविष्णु सूक्त
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अग्ना॑विष्णू॒ महि॒ धाम॑ प्रि॒यं वां॑ वी॒थो घृ॒तस्य॒ गुह्या॑ जुषा॒णौ। दमे॑दमे सुष्टु॒त्या वा॑वृधा॒नौ प्रति॑ वां जि॒ह्वा घृ॒तमुच्च॑रण्यात् ॥
स्वर सहित पद पाठअग्ना॑विष्णू॒ इति॑ । महि॑ । धाम॑ । प्रि॒यम् । वा॒म् । वी॒थ: । घृ॒तस्य॑ । गुह्या॑ । जु॒षा॒णौ । दमे॑ऽदमे । सु॒ऽस्तु॒त्या । व॒वृ॒धा॒नौ । प्रति॑ । वा॒म् । जि॒ह्वा । घृ॒तम् । उत् । च॒र॒ण्या॒त् ॥३०.२॥
स्वर रहित मन्त्र
अग्नाविष्णू महि धाम प्रियं वां वीथो घृतस्य गुह्या जुषाणौ। दमेदमे सुष्टुत्या वावृधानौ प्रति वां जिह्वा घृतमुच्चरण्यात् ॥
स्वर रहित पद पाठअग्नाविष्णू इति । महि । धाम । प्रियम् । वाम् । वीथ: । घृतस्य । गुह्या । जुषाणौ । दमेऽदमे । सुऽस्तुत्या । ववृधानौ । प्रति । वाम् । जिह्वा । घृतम् । उत् । चरण्यात् ॥३०.२॥
भाष्य भाग
हिन्दी (4)
विषय
बिजुली और सूर्य के गुणों का उपदेश।
पदार्थ
(अग्नाविष्णू) हे बिजुली और सूर्य (वाम्) तुम दोनों का (महि) बड़ा (प्रियम्) प्रीति करनेवाला (धाम) धर्म वा नियम है, तुम दोनों (घृतस्य) सार रस के (गुह्या) सूक्ष्मतत्त्वों को (जुषाणौ) सेवन करते हुए (वीथः) प्राप्त होते हो। (दमेदमे) घर घर में (सुष्टुत्या) बड़ी स्तुति के साथ (वावृधानौ) वृद्धि करते हुए [रहते हो,] (वाम्) तुम दोनों की (जिह्वा) जयशक्ति (घृतम्) सार रस को (प्रति) प्रत्यक्ष रूप से (उत्) उत्तमता के साथ (चरण्यात्) प्राप्त हो ॥२॥
भावार्थ
बिजुली वा शारीरिक अग्नि और सूर्य के नियम बड़े अद्भुत हैं, बिजुली अन्न के रस से शरीर को पुष्टि करती और सूर्य मेघ की जलवृष्टि से संसार को बढ़ाता है ॥२॥
टिप्पणी
२−(अग्नाविष्णू) म० १। विद्युत्सूर्यौ (धाम) धर्मः। नियमः (प्रियम्) प्रीतिकरम् (वीथः) वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु। गच्छथः। प्राप्नुथः (घृतस्य) साररसस्य (गुह्या) गुप्तानि। सूक्ष्मतत्त्वानि (सुष्टुत्या) शोभनया स्तुत्या (वावृधानौ) वर्धमानौ (उत्) उत्तमतया। अन्यत्पूर्ववत्-म० १ ॥
विषय
महि प्रियं धाम
पदार्थ
१. हे (अग्नाविष्णू) = अग्नि तथा विष्णु, अर्थात् आगे बढ़ने की प्रवृत्ति तथा उदारता ! (वाम्) = आपका धाम तेज महि महत्त्वपूर्ण है तथा (प्रियम्) = प्रीतिकर है। आप (जुषाणौ) = परस्पर प्रीतियुक्त होते हुए-मिलकर हममें निवास करते हुए (घृतस्य) = ज्ञानदीत प्रभु के (गुह्या) = हृदय-गुहा में स्थित गूढरूपों को (वीथ:) = प्राप्त कराते हो, अपने अन्दर प्रादुर्भूत करते हो [प्रजन]। २. (दमेदमे) = प्रत्येक शरीर-गृह में (सुष्टुत्या) = प्रभु के उत्तम स्तवन से (वावृधानौ) = आप खूब ही वृद्धि को प्राप्त हो। प्रभुस्मरण से हममें आगे बढ़ने की भावना व उदारता का वर्धन होता है। हे अग्नाविष्णू! (वाम्) = आपकी यह (जिह्वा) = जिहा (घुतम्) = ज्ञानदीप्त प्रभु को (प्रति उच्चरण्यात्) = प्रतिदिन उच्चरित करे, प्रभुनाम का ही स्मरण करे।
भावार्थ
अग्नि तथा विष्णु [आगे बढ़ने की भावना व उदारता] हमें तेजस्वी बनाती है, प्रभुस्मरण में प्रवृत्त करती है। वस्तुत: प्रभुस्मरण से ही ये वृत्तियाँ विकसित होती हैं।
अग्नि व विष्णु का उपासक 'भृगु'-तेजस्वी व अंगिरा:'-अंग-प्रत्यंग में रसवाला बनता है। यह 'भृग्वगिरा:' ही अगले दो सूक्तों का ऋषि है -
भाषार्थ
(अग्नाविष्णू) हे अग्नि और विष्णु [सूर्य] (वाम्) तुम दोनों का (महिधाम) महातेज (प्रियम्) प्रिय है, तुम दोनों (घृतस्य) घृत के (गुह्या = गुह्यानि) अप्रसिद्ध चरु पुरोडाश आदि पदार्थों का (जुषाणौ) प्रीतिपूर्वक सेवन करते हुए (वीथः) भक्षण करते हो। (दमे दमे) घर-घर मैं (सुष्टुत्या = सुष्टुत्यौ) उत्तम विधि से स्तुति प्राप्त करते हो, (वावृधानौ) हमें बढ़ाते हो (वाम्) तुम दोनों की (जिह्वा) जिह्वा (घृतम् प्रति) घृत की ओर [आ कर] इसे (उच्चरण्यात्) ऊर्ध्वगति प्रदान करे।
टिप्पणी
[घृत द्वारा तैयार किये गये हव्यों की आहुतियां अग्नि के तेज में तथा सूर्य के उदित होने पर देनी चाहिये। ये दोनों तेजावस्थाएं आहुतियों के निमित्त प्रिय हैं। "सुष्टुत्या" का अभिप्राय है कि मन्त्रोच्चारण पूर्वक आहव्य देवों के गुणधर्मों का कथन करते हुए आहुतियां देना। आहुतियों द्वारा घर-घर में वृद्धि होती है। "उच्चरण्यात्" अग्नि में आहुति देने तथा सूर्य के उदित हुए आहुति देने से यज्ञधूम की गति ऊर्ध्वं अन्तरिक्ष में जा कर फैल जाती है। "उच्चरण्यात्"= उत् (ऊर्ध्वम्) + चरण्यात् (चरण गतौ, कण्ड्वादिः)]।
विषय
अग्नि और विष्णु की स्तुति।
भावार्थ
हे (अग्नाविष्णू) अग्ने और विष्णो ! (वां) आप दोनों का (महि) बड़ा (प्रियम्) मनोहर (धाम) तेज और धारण सामर्थ्य है। और आप दोनों (घृतस्य) ज्योतिर्मय आत्मा के (गुह्या) गुह्य, गूढ़ रहस्यमय तत्वों ज्ञानमय और कर्ममय रहस्यों को (जुषाणौ) सेवन करते हुए (वीथः) उनको प्राप्त करते हो। (दमे-दमे) प्रत्येक घर या देह में (सु स्तुत्या) उत्तम स्तुति, ज्ञानशक्ति से (वावृधानौ) वृद्धि को प्राप्त होते रहते हो। (वां) आप दोनों की (जिह्वा) जिह्वा, आदान शक्ति (प्रति घृतम्) प्रत्येक घृत, तेजोमय उल्लास को (उत् चरण्यात्) प्राप्त करे। राष्ट्र में अग्नि-विष्णु = राजा, मन्त्री, राजा सेनापति। गृहस्थ में अग्नि-विष्णु = यजमान और पुरोहित। आधिदैविक में अग्नि विष्णु = अग्नि और सूर्य। घृत=जल।
टिप्पणी
missing
ऋषि | देवता | छन्द | स्वर
मेधातिथिर्ऋषिः। अग्नाविष्णू देवते। १, २ त्रिष्टुभौ। द्व्यृचं सूक्तम्।
इंग्लिश (4)
Subject
Fire and the Sun
Meaning
Agna-Vishnu, fire and sun, fire and yajna, dear and high is your place, position and law in human life. Loving and joining the secret power and graces of yajna ghrta, you accept, enjoy and augment the secret efficacy of ghrta. Growing and rising with progress and well being in every home, may the flames and rays receive the ghrta oblations and in response augment and exalt the grace and glory of the home.
Subject
Dyava - prthivi (pair)
Translation
O fire divine and O sacrifice, greatly pleasing in your abode, you partake of the mystic purified butter relishing it, growing strong in each and every house (dame-dame) goodly with praises (su stutyi) may the tongue of both of you taste that (mystic) purified butter.
Comments / Notes
MANTRA NO 7.30.2AS PER THE BOOK
Translation
These fire and yajna possess great lovely glory and splendor. They obtain the essence of ghee taking the myserious benefit thereof. Let both of them take the offered ghee through their flames, exalted in each house with fair laudation.
Translation
O householder and priest, ye love the great law, joying Ye feast on the soul's essences of knowledge and action. Exalted in each house with fair laudation, let your strength of assimilation establish explicitly that essence of knowledge!
Footnote
अग्नि विष्णु may also mean king and Minister, or King and Commander-in-chief, or fire and Sun
संस्कृत (1)
सूचना
कृपया अस्य मन्त्रस्यार्थम् आर्य(हिन्दी)भाष्ये पश्यत।
टिप्पणीः
२−(अग्नाविष्णू) म० १। विद्युत्सूर्यौ (धाम) धर्मः। नियमः (प्रियम्) प्रीतिकरम् (वीथः) वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु। गच्छथः। प्राप्नुथः (घृतस्य) साररसस्य (गुह्या) गुप्तानि। सूक्ष्मतत्त्वानि (सुष्टुत्या) शोभनया स्तुत्या (वावृधानौ) वर्धमानौ (उत्) उत्तमतया। अन्यत्पूर्ववत्-म० १ ॥
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