Loading...
ऋग्वेद मण्डल - 6 के सूक्त 48 के मन्त्र
मण्डल के आधार पर मन्त्र चुनें
अष्टक के आधार पर मन्त्र चुनें
  • ऋग्वेद का मुख्य पृष्ठ
  • ऋग्वेद - मण्डल 6/ सूक्त 48/ मन्त्र 11
    ऋषिः - शंयुर्बार्हस्पत्यः देवता - मरुतः छन्दः - उष्णिक् स्वरः - ऋषभः

    आ स॑खायः सब॒र्दुघां॑ धे॒नुम॑जध्व॒मुप॒ नव्य॑सा॒ वचः॑। सृ॒जध्व॒मन॑पस्फुराम् ॥११॥

    स्वर सहित पद पाठ

    आ । स॒खा॒यः॒ । स॒बः॒ऽदुघा॑म् । धे॒नुम् । अ॒ज॒ध्व॒म् । उप॑ । नव्य॑सा । वचः॑ । सृ॒जध्व॑म् । अन॑पऽस्फुराम् ॥


    स्वर रहित मन्त्र

    आ सखायः सबर्दुघां धेनुमजध्वमुप नव्यसा वचः। सृजध्वमनपस्फुराम् ॥११॥

    स्वर रहित पद पाठ

    आ। सखायः। सबःऽदुघाम्। धेनुम्। अजध्वम्। उप। नव्यसा। वचः। सृजध्वम्। अनपऽस्फुराम् ॥११॥

    ऋग्वेद - मण्डल » 6; सूक्त » 48; मन्त्र » 11
    अष्टक » 4; अध्याय » 8; वर्ग » 3; मन्त्र » 1
    Acknowledgment

    संस्कृत (1)

    विषयः

    केऽत्र सुहृदः सन्तीत्याह ॥

    अन्वयः

    हे सखायो ! यूयं नव्यसा सबर्दुघामनपस्फुरां धेनुमजध्वम्। वच उपाऽऽसृजध्वम् ॥११॥

    पदार्थः

    (आ) (सखायः) सुहृदः (सबर्दुघाम्) सर्वकामनाप्रपूरिकाम् (धेनुम्) वाचम्। धेनुरिति वाङ्नाम। (निघं०१.११) (अजध्वम्) प्राप्नुत (उप) (नव्यसा) अतिशयेन नवीनाध्यापनेनोपदेशेन वा (वचः) वचनम् (सृजध्वम्) विविधविद्यायुक्तं कुरुत (अनपस्फुराम्) निश्चलां दृढाम् ॥११॥

    भावार्थः

    ये सुहृदो भूत्वा सत्यां सुशिक्षितां वाचं विद्यां च विद्यार्थिनो ग्राहयन्ति ते जगच्छोधका भवन्ति ॥११॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    हिन्दी (3)

    विषय

    कौन इस संसार में मित्र हैं, इस विषय को कहते हैं ॥

    पदार्थ

    हे (सखायः) मित्रवर्गो ! तुम (नव्यसा) अतीव नवीन पढ़ाने वा उपदेश करने से (सबर्दुघाम्) समस्त कामनाओं की पूर्ण करनेवाली (अनपस्फुराम्) निश्चल दृढ़ (धेनुम्) वाणी को (अजध्वम्) प्राप्त करिये तथा (वचः) अर्थात् वचन को (उप, आ, सृजध्वम्) विविध प्रकार की विद्या से युक्त करो ॥११॥

    भावार्थ

    जो सुहृद् होकर सत्य, सुन्दर शिक्षायुक्त वाणी और विद्या को विद्यार्थियों को ग्रहण कराते हैं, वे संसार के शुद्ध करनेवाले होते हैं ॥११॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    missing

    भावार्थ

    जिस प्रकार लोग (सबर्दुधाम् अनपस्फुराम् धेनुम् आ अजन्ति, ( आ सृजन्ति ) दूध देने वाली, न मारने योग्य गौ को प्राप्त करते हैं और वध बंधन आदि से मुक्त करते हैं हे ( सखायः ) स्नेही मित्रो ! आप लोग भी उसी प्रकार (सबर्दुधाम् ) ज्ञानरस, और सुखदायक अन्न आदि को दोहन करने वाली, (अनपस्फुराम् ) कभी नाश न होने वाली, अविनाश्य ( धेनुम् ) वेद वाणी और भूमि की ( नव्यसा ) नये और स्तुत्य उपाय, अध्ययनाध्यापन तथा हलाकर्षणादि से ( आ अजध्वम् ) प्राप्त करो और भूमि को जोड़ो, और उत्तम ( वचः आ सृजध्वम्) वचन बोलो । भूमि से ( वचः = पचः ) परिपक्व अन्न पैदा करो ।

    टिप्पणी

    missing

    ऋषि | देवता | छन्द | स्वर

    शंयुर्बार्हस्पत्य ऋषिः। तृणपाणिकं पृश्निसूक्तं ॥ १–१० अग्निः। ११, १२, २०, २१ मरुतः । १३ – १५ मरुतो लिंगोत्का देवता वा । १६ – १९ पूषा । २२ पृश्निर्धावाभूमी वा देवताः ॥ छन्दः – १, ४, ४, १४ बृहती । ३,१९ विराड्बृहती । १०, १२, १७ भुरिग्बृहती । २ आर्ची जगती। १५ निचृदतिजगती । ६, २१ त्रिष्टुप् । ७ निचृत् त्रिष्टुप् । ८ भुरिक् त्रिष्टुप् । ६ भुरिग् नुष्टुप् । २० स्वरराडनुष्टुप् । २२ अनुष्टुप् । ११, १६ उष्णिक् । १३, १८ निचृदुष्णिक् ।। द्वाविंशत्यृचं सूक्तम् ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    विषय

    'सबर्दुघा-अनपस्फुरा' वेद धेनु

    पदार्थ

    [१] हे (सखायः) = समान ख्यान [ज्ञान प्राप्ति के क्रम] वाले मित्रो ! (सबर्दुघाम्) = इस ज्ञानदुग्ध को देनेवाली (धेनुम्) = वेदवाणी रूप धेनु को (आ अजध्वम्) = अपनी ओर सर्वथा गतिवाला करो । [२] इस (अनपस्फुराम्) = [not refusing to be milked] सुखसंदोह्य अथवा अवध्य वेद धेनु को (नव्यसा वचः) = [वचसा] अत्यन्त स्तुत्य वचनों के हेतु से (उपसृजध्वम्) = अपने साथ सृष्ट करो, इसे अपने समीप करो, इसे अपनाओ । इसके अध्ययन से ज्ञानदुग्ध का तुम पान करनेवाले बनो।

    भावार्थ

    भावार्थ- यह वेद धेनु 'अनपस्फुरा' सुख संदोह्य व अवध्य है। इसका हम नियमपूर्वक दोहन करें।

    इस भाष्य को एडिट करें

    मराठी (1)

    भावार्थ

    जे सृहृद बनून सत्य, सुंदर सुशिक्षित वाणी व विद्या विद्यार्थ्यांना ग्रहण करवितात ते जगाची शुद्धी करतात. ॥ ११ ॥

    इस भाष्य को एडिट करें

    इंग्लिश (2)

    Meaning

    Come ye friends all, let us develop the language and culture of versatile possibilities of creative achievement by the latest methods and media of communication, and let us create a new and unshakable body of knowledge and language of lasting value.

    इस भाष्य को एडिट करें

    Subject [विषय - स्वामी दयानन्द]

    How should the enlightened men teach children-is further told.

    Translation [अन्वय - स्वामी दयानन्द]

    O friends ! with new method of teaching and preaching, obtain a speech which fulfils all good desires and is unshakable and firm. Utter words which are endowed with the knowledge of various sciences.

    Commentator's Notes [पदार्थ - स्वामी दयानन्द]

    N/A

    Purport [भावार्थ - स्वामी दयानन्द]

    Those persons are the purifiers of the world, who being friendly convey to the students a knowledge imparting, divine speech.

    Foot Notes

    (सबर्दुंधाम्) सर्वकामनाप्रपूरिकाम् । स्फुर-स्फुरणे- स्फुरणंचलनम् । = Fulfiller of all good desires. (धेनुम्) वाचम् । धेनुरिति वाङ्नाम (NG 1, 11)। = Speech. (अनपस्फुराम्) निश्चलां दृढाम् |= Unshakable or firm (अजध्वम्) प्राप्नुत । अज-गतिक्षेपणायोः (भ्वा०) गतेस्त्रिष्वर्येष्वत्र प्राप्त्यर्थं ग्रहणम्। = To obtain.

    इस भाष्य को एडिट करें
    Top